माइटनेरियम (Mt)
माइटनेरियम: मायावी, अतिभारी तत्व
माइटनेरियम एक मानव निर्मित, अत्यधिक रेडियोधर्मी धातु है। इसके अब तक केवल कुछ ही परमाणु बने हैं, और सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाला समस्थानिक क्षय होने से पहले केवल 8 सेकंड तक जीवित रहता है। इस कारण, इसका कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है—इसका महत्व वैज्ञानिक अनुसंधान में है। इस तत्व का नाम भौतिक विज्ञानी लिज़ माइटनर के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने परमाणु विखंडन की खोज में मदद की थी।
एक मानव निर्मित तत्व
माइटनेरियम प्रकृति में मौजूद नहीं है—इसे केवल प्रयोगशालाओं में ही बनाया जा सकता है। इसे बनाने के लिए, वैज्ञानिकों ने लौह आयनों को बिस्मथ परमाणुओं में तोड़ने के लिए एक भारी आयन त्वरक का उपयोग किया। 1982 में, इस प्रक्रिया (एक प्रकार का “शीत संलयन”) से माइटनेरियम-266 का एक परमाणु उत्पन्न हुआ।
खोज का इतिहास
प्रथम संश्लेषण (1982): पीटर आर्मब्रस्टर और गॉटफ्रीड मुंज़ेनबर्ग के नेतृत्व में जीएसआई डार्मस्टाट में एक जर्मन शोध दल ने माइटनेरियम के एक परमाणु का पता लगाने से पहले पूरे एक सप्ताह तक काम किया।
आधिकारिक मान्यता (1997): अंतर्राष्ट्रीय शुद्ध एवं अनुप्रयुक्त रसायन संघ (IUPAC) ने इस खोज की पुष्टि की और लिसे माइटनर के सम्मान में इस तत्व का नाम माइटनेरियम रखा।
जैविक भूमिका
माइटनेरियम की जीवित प्राणियों में कोई भूमिका नहीं है। वास्तव में, अपनी अत्यधिक रेडियोधर्मिता के कारण यह खतरनाक हो सकता है—लेकिन चूँकि यह लगभग तुरंत ही क्षय हो जाता है, इसलिए इसे जीव विज्ञान के साथ अंतःक्रिया करने का कभी अवसर नहीं मिलता।