टेल्यूरियम (Te)
टेल्यूरियम: दुर्लभ अर्ध-धातु
टेल्यूरियम एक भंगुर, चांदी-धूसर रंग की अर्ध-धातु है जो आमतौर पर पाउडर के रूप में पाई जाती है। यह पृथ्वी की पपड़ी में काफी दुर्लभ है, और इसका नाम लैटिन शब्द टेलस से आया है, जिसका अर्थ है “पृथ्वी”। इसकी खोज सेलेनियम के तुरंत बाद हुई थी, जिसका नाम चंद्रमा के नाम पर रखा गया था—इसलिए, दोनों मिलकर पृथ्वी और चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करते हैं! 🌍🌙
टेल्यूरियम क्यों उपयोगी है?
टेल्यूरियम अन्य पदार्थों के गुणों में सुधार करता है और आधुनिक तकनीक में महत्वपूर्ण है:
मिश्रधातु:
तांबे और स्टील में मिलाया जाता है ताकि उन्हें मशीनिंग (काटने और आकार देने) में आसानी हो।
सीसे के साथ मिलाने पर, यह कठोरता और अम्ल के प्रति प्रतिरोध को बढ़ाता है, जिससे यह अधिक मजबूत और टिकाऊ हो जाता है।
तकनीक: रीराइटेबल सीडी और डीवीडी, सौर सेल और चांदी या सोने के साथ मिलकर अर्धचालक के रूप में उपयोग किया जाता है। यह तेल शोधन में उत्प्रेरक भी है।
काँच और चीनी मिट्टी: टेल्यूरियम यौगिकों का उपयोग काँच और चीनी मिट्टी की वस्तुओं को रंगने के लिए किया जाता है।
जैविक भूमिका
टेल्यूरियम की कोई जैविक भूमिका नहीं है और यह अत्यधिक विषैला होता है। इसकी थोड़ी सी मात्रा भी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। इसके संपर्क में आने का एक अजीब प्रभाव “टेल्यूरियम श्वास” है - शरीर द्वारा इस तत्व के प्रसंस्करण के कारण साँस में लहसुन जैसी तेज़ गंध आती है।
प्राकृतिक प्रचुरता
टेल्यूरियम पृथ्वी की पपड़ी में पाए जाने वाले सबसे दुर्लभ तत्वों में से एक है। यह आमतौर पर खनिजों में टेल्यूराइड के रूप में पाया जाता है और तांबे के शोधन के उप-उत्पाद के रूप में व्यावसायिक रूप से प्राप्त किया जाता है।
टेल्यूरियम की खोज का इतिहास
1783 - पहली खोज: रोमानियाई रसायनज्ञ फ्रांज जोसेफ मुलर वॉन रीचेंस्टीन ने एक अयस्क का अध्ययन किया जिसके बारे में उन्हें लगा कि उसमें एंटीमनी या बिस्मथ है। तीन साल के सावधानीपूर्वक परीक्षण के बाद, उन्हें एहसास हुआ कि यह एक नया तत्व था।
1798 - आधिकारिक नामकरण: उन्होंने जर्मन रसायनज्ञ मार्टिन क्लैप्रोथ को एक नमूना भेजा, जिन्होंने खोज की पुष्टि की और तत्व का नाम पृथ्वी के नाम पर टेल्यूरियम रखा।